जब शिक्षा सड़क पर हो और सत्ता ख़ामोश,तब सवाल सिर्फ़ एक आंदोलन का नहीं, पूरे राष्ट्र की प्राथमिकताओं का होता है - अनवर खान
जब शिक्षा सड़क पर हो और सत्ता ख़ामोश,तब सवाल सिर्फ़ एक आंदोलन का नहीं, पूरे राष्ट्र की प्राथमिकताओं का होता है - अनवर खान
इतिहास हमेशा बड़ी-बड़ी इमारतों, भाषणों और फ़ैसलों में दर्ज नहीं होता कभी-कभी वह ज़मीन पर छूटे हुए जूतों में भी लिखा जाता है.
अगर छात्रों की आवाज़ उठाना सियासत है तो हम एैसी सियासत करते रहेंगे...छात्रों की मांगें तत्काल पूरी हों उनके भविष्य और न्याय पर कोई समझौता नहीं
हिंदुस्तान समाचार जगदलपुर....
छत्तीसगढ़ राज्य मदरसा बोर्ड के पुर्व सदस्य व कांग्रेस नेता अनवर खान ने छात्रों के साथ हुए लाठी चार्ज की कड़े शब्दों में निंदा कर मोदी सरकार पर प्रहार किया और कहा जब शिक्षा सड़क पर हो और सत्ता खामोश तब सवाल सिर्फ एक आंदोलन का नही पूरे राष्ट्र की प्राथमिकताओं का होता है किसी देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी इमारतें नहीं, बल्कि उसके युवाओं के सपने और उनका भविष्य होता है। जब छात्रों को किताबें छोड़कर अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरना पड़े, तो यह केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि पूरे देश के भविष्य का सवाल बन जाता है।*
*अनवर खान ने कहा युवाओं की आवाज़ सुनना, उनके सपनों को सम्मान देना और उन्हें बेहतर अवसर देना ही एक मजबूत और विकसित राष्ट्र की पहचान है जिसे पूरा करने में मोदी सरकार पूरी तरह फेल हो चुकी है। इतिहास हमेशा बड़ी-बड़ी इमारतों, भाषणों और फ़ैसलों में दर्ज नहीं होता, कभी-कभी वह ज़मीन पर छूटे हुए जूतों में भी लिखा जाता है, क्योंकि जूते कभी अपने आप नहीं छूटते. वे तब छूटते हैं, जब हालात इंसान को पलटकर देखने की मोहलत भी नहीं देते,ये जूते उन पैरों के हैं, जो उम्मीद लेकर घर से निकले थे। बेहतर कल की उम्मीद में. लेकिन लौटते वक़्त... कई लोगों के पैरों में जूते नहीं थे. और उम्मीद? लाठी चली... लोग भागे... जूते-चप्पल रह गए। हम नहीं जानते...इनमें से कौन-सी जोड़ी किसकी है. लेकिन इतना ज़रूर जानते हैं कि इस देश में हर किसी के लिए जूते छोड़कर चले जाना आसान नहीं होता। इन चप्पलों का यूँ छूट जाना सिर्फ़ एक सामान का छूट जाना नहीं है, ये उस अफरातफरी की तस्वीर है जहाँ किसी को अपने जूतों से ज़्यादा अपनी साँसों की फ़िक्र थी. आज ये सब जंतर-मंतर की ज़मीन पर रखे हैं. ये सिर्फ़ इस बात की गवाही है कि उस दिन वहाँ लोग थे जो अपने-अपने घरों से निकले थे. हक़ मांगने. इन जूतों का कोई नाम नहीं है. लेकिन हर जोड़ी के पीछे एक चेहरा है.एक घर, एक परिवार,एक इंतज़ार है.और शायद...एक सपना भी।
अनवर खान ने कहा लश्कर भी तुम्हारा, सरदार भी तुम्हारा, तुम झुठ को सच लिख दो अखबार भी तुम्हारा, इस दौर के फरियादी जायें तो कहाँ जायें, कानून तुम्हारा, दरबार भी तुम्हारा" इतना मत डराओ के लोग डरना छोड़ दे, अगर छात्रों की आवाज़ उठाना सियासत है तो हम एैसी सियासत करते रहेंगे। छात्रों की मांगें तत्काल पूरी हो उनके भविष्य और न्याय पर कोई समझौता नहीं।देश का छात्र आज कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़ा है, क्योंकि यह लड़ाई केवल NEET या किसी एक परीक्षा की नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य, समान अवसर और न्याय की लड़ाई है।
Comments
Post a Comment